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गुस्ताखी माफ: परिवहन विषाद के दौर से गुजर रहा छत्तीसगढ़

By @dmin Published July 29, 2022
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गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
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-दीपक रंजन दास
पिछले कुछ दशकों में एक-एक कर सार्वजनिक परिवहन सेवाएं या तो महंगी हो गई हैं या फिर विरल। दोनों ही स्थितियां उन करोड़ों लोगों के लिए मुसीबत कारण बन रही हैं जो इनके नियमित उपयोगकर्ता हैं। विद्यार्थी पढऩे के लिए तो नौकरी पेशा लोग काम पर जाने के लिए ऐसा सस्ता परिवहन ढूंढते हैं जिससे उनकी जेब पर ज्यादा बोझ न पड़े। पर सरकार ने इस विषय को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं। निजी ट्रांसपोर्टरों को लाभान्वित करने के लिए सरकारी वाहन एक-एक कर सड़क छोडऩे लगीं। एक कोशिश 10 साल पहले छत्तीसगढ़ में हुई थी जब यहां बड़ी संख्या में सिटी बसें मंगवाई गई थीं। पर इनका संचालन कभी भी ढंग से हो नहीं पाया। शर्त यह थी कि इन बसों का संचालन निजी कंपनी करेगी और 10 साल बाद ये बसें उनकी हो जाएंगी। इसके बाद यह उनकी मर्जी पर निर्भर होगा कि वे इसमें बस पास जारी करें या नहीं। यहां तक कि मंत्रालय स्टाफ के लिए भी परिवहन इनकी जिम्मेदारी नहीं रह जाएगी। इधर रेलवे ने भी धीरे धीरे एमएसटी यानी कि मंथली सीजन टिकट से अपने हाथ खींचना शुरू कर दिया है। लोकल ट्रेनों की संख्या बढ़ती नहीं और एक्सप्रेस ट्रेनों के स्लीपर में एमएसटी अमान्य हैं। अब तक टीटीई स्लीपर में एमएसटी धारकों को अनुमित दे देती थी पर अब ऐसा भी नहीं है। परिवहन की जरूरत शहरों के भीतर भी होती है। इसका बेहतरीन उदाहरण कोलकाता शहर है जहां आज भी लोग सौ-सौ किलोमीटर की दूरी तय कर मामूली नौकरियां करने चले जाते हैं। कहा जाता है कि पूरा पश्चिम बंगाल नौकरी करने के लिए कोलकाता आता है और शाम होते ही वापस लौट जाता है। वजह एक ही है कि यहां सार्वजनिक बसों का किराया बहुत कम है। दूसरी वजह वहां की मजबूत लोकल ट्रेन नेटवर्क है। इसकी तुलना छत्तीसगढ़ के भिलाई से करें तो खुर्सीपार से नेहरू नगर आकर नौकरी करना छोटी-मोटी नौकरी करने वालों के लिए असंभव है। 5-6 हजार रुपए की नौकरी में यदि पेट्रोल का खर्चा ही 2 हजार रुपए से अधिक हो जाएगा तो व्यक्ति नौकरी कैसे करेगा। यह संकट उन शहरों का भी है जो आधुनिक रोजगार के केन्द्र बने हुए हैं। शहर की बाहरी परिधि से यहां नौकरी के लिए आना जाना इतना कठिन है कि नियोक्ता को दुगनी से ज्यादा वेतन देकर लोगों को नियुक्त करना पड़ता है। परिवहन सुविधा नहीं होने के कारण इन शहरों में किराये की खोली प्राप्त करना स्वर्गारोहण करने जितना ही कठिन है। एक कमरा, किचन, बाथरूम का किराया 24 से लेकर 40 हजार रुपए तक है। ऐसे शहरों में सबकुछ महंगा हो जाता है। सार्वजनिक क्षेत्र की परिवहन सुविधा को शहरों का लाइफ लाइन माना जाना चाहिए।

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