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गुस्ताखी माफ: इन सड़कों पर आंखों की जरूरत क्या है

By @dmin
Published: July 28, 2022
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गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
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-दीपक रंजन दास
वाहन खरीदने के बाद उसकी ठीक ढंग से पूजा करवा लेना पर्याप्त है। पंडित जी इंजन से लेकर बोनट तक पर सिन्दूर से ओम या स्वस्तिक का निशान बना देते हैं। इसके बाद एक नारियल फोड़ते हैं और फिर टायरों के नीचे नींबू कुचल देते हैं। मानें या न मानें, इसके बाद गाड़ी बेहद सुरक्षित हो जाती है और फलती भी है। शायद यही वजह है कि भारतीय दुपहिया चालक हेलमेट तभी लगाते हैं जब पुलिस डंडा मारती है। चार पहिया चालक कभी सीट बेल्ट नहीं लगाते। जिन गाडिय़ों में सीटबेल्ट पीं-पीं करता है उसे सीट के पीछे से घुमाकर साकेट में अटका देते हैं। यह पीं-पीं का परमानेंट इलाज है। इससे भी ज्यादा मजेदार उनकी व्यस्तता है। विद्यार्थियों से लेकर बड़े लोगों के हाथ-कान में मोबाइल फोन इस कदर चिपका है कि सड़क पर भी जुदा नहीं होना चाहता। सच्चा प्यार जो ठहरा। जब से बिना गियर की गाडिय़ों का चलन बढ़ा है लोग दुपहिया एक हाथ से चलाने लगे हैं। दूसरा हाथ कान पर मोबाइल को चिपकाए रखता है। भीड़ कितनी भी हो, फोन वाला हाथ हैंडल पर नहीं आता। ऐसा कर पाने वाला विशेष रूप से दक्ष माना जाता है। ऐसे में खबर आती है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एक तिहाई वाहन चालकों को ठीक से दिखाई नहीं देता। उनकी आंखों में तकलीफ है और उन्हें इलाज की जरूरत है। इनमें मोतियाबंद, रिफ्रैक्टिव एरर और रक्तांध, सभी शामिल हैं। इसके बावजूद ये सब सालों से गाडिय़ां चला रहे हैं। लिहाजा कहा जा सकता है कि भरतीय सड़कों पर वाहन चलाने के लिए आंखों का होना कतई जरूरी नहीं है। शायद इसलिए सड़क चल रहे लोगों को कभी न कभी ये सुनना पड़ ही जाता है- “अंधा है क्या?”। अब आते हैं इसके दूसरे पहलू पर। प्रदेश की सड़कों पर प्रतिदिन औसतन 38 सड़क हादसे होते हैं। इन हादसों में 16 लोग जान गंवा देते हैं। इनमें से 29.76 हादसे नेशनल हाइवे पर और 17.9 प्रतिशत स्टेट हाइवे पर होते हैं। बाकी हादसे गली मोहल्लों में होते हैं। शासन ने पिछले साल 3,508 वाहन चालकों की आंखों की जांच करवाई थी। इनमें से 1245 चालकों की आंखों में दिक्कतें मिलीं। सरकार ने आंकड़े जुटाकर शायद यह संदेश देने की कोशिश की कि सड़कों पर सावधान-अंधे गाड़ी चला रहे हैं। सरकार को कहने की जरूरत नहीं है। लोगों को पहले से ही पता है कि सड़कों पर अंधों की अच्छी खासी संख्या है। सामने से आ रहे लोगों को भी भोंपू बचाकर सावधान करना पड़ता है। सरकार वह करे जो उससे अपेक्षित है। आरटीओ ऑफिस की भर्राशाही को खत्म करे। आज भी दलाल टाइप के लोग ड्राइविंग लाइसेंस से लेकर गाडिय़ों का फिटनेस तक झटपट करवा देते हैं।

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