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गुस्ताखी माफ: आत्मानंद स्कूलों के चलते कलप रही आत्मा

By @dmin
Published: June 25, 2022
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गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
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-दीपक रंजन दास
छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने 76 नए आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम उत्कृष्ट विद्यालयों की घोषणा कर दी है। इन स्कूलों में इसी सत्र से अध्यापन प्रारंभ हो जाएगा। नए स्कूलों में 45 हजार 500 बच्चों को दाखिला मिल सकेगा। राज्य में 171 आत्मानंद स्कूल पहले से संचालित हैं जिनमें 1.35 लाख बच्चे अध्ययनरत हैं। इसका मतलब यह हुआ कि पौने दो लाख से अधिक बच्चे सरकारी अंग्रेजी माध्यम स्कूल में नि:शुल्क या मामूली शुल्क में अध्ययन कर सकेंगे। जब से आत्मानंद स्कूल आए हैं, निजी स्कूल संचालकों की आत्मा कलप रही है। शहर के एक बड़े निजी स्कूल संचालक ने हताश होकर कहा कि सस्ती पढ़ाई सस्ती होती है। आत्मानंद स्कूल निजी स्कूलों की व्यवस्था को टक्कर नहीं दे पाएंगे। जब उनसे पूछा गया कि बच्चे तो बच्चे आपके टीचर भी आत्मानंद की ओर भाग रहे हैं तो उनके पास कोई जवाब नहीं था। एक अन्य बड़े स्कूल के संचालक ने कहा कि आत्मानंदजी से मुख्यमंत्री का लगाव रहा है। मुख्यमंत्री इन स्कूलों की फंडिंग कर रहे हैं। सरकार बदलेगी तो ये स्कूल भी बदहाली का शिकार हो जाएंगे। हालांकि इस सवाल का वे कोई जवाब नहीं दे पाए कि क्या आने वाली सरकार निजी स्कूलों की पपेट सरकार होगी। कुछ निजी स्कूल संचालक जहां नए विकल्पों की तलाश कर रहे हैं वहीं एक स्कूल का संचालक अब इलेक्ट्रानिक मीडिया के क्षेत्र में पदार्पण कर रहा है। उद्यमिता तो रास्ता तलाश ही लेती है पर दिक्कत उनकी है जिनके पास कोई सोच नहीं है। उनके पास केवल बाप का छोड़ा पैसा है। जिस क्षेत्र में लोग कमाते दिखाई देते हैं, उसी क्षेत्र में पदार्पण करते हैं। बाजार को खराब करते हैं और फिर किसी और क्षेत्र में घुसकर मुंह मारने लगते हैं। रही बात निजी और सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता की तो इसके तीन प्रमुख कारण हैं। निजी स्कूल का संचालक अपने टीचरों को दिया हुआ एक-एक पैसा वसूलता है जबकि सरकारी मुलाजिम-सरकारी मुलाजिम होता है। डीईओ, बीईओ से लेकर प्राचार्य और हेडमास्टर तक से ऐसी कोई उम्मीद नहीं की जाती। जिन स्कूलों में आदर्श शिक्षक या प्रधानपाठक होते हैं वहां की गुणवत्ता अपने आप दिखाई देने लगती है। निजी स्कूलों का दावा है कि उनके यहां के बच्चे अंग्रेजी बोलना-लिखना सीख जाते हैं। हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं है। 70 फीसदी बच्चों को अंग्रेजी तो क्या ठीक से हिन्दी लिखना भी नहीं आता। भाषा कोई भी बच्चा अपने परिवेश से सीखता है। ट्यूशन और कोचिंग वालों के चलते बच्चे ‘रटंत विद्या फलंत नाहीÓ के भंवर में फंस गए हैं। रटाया गया तो वे संस्कृत का श्लोक भी बोल लेते हैं पर अपनी मर्जी से गाय पर निबंध भी नहीं लिख पाते। तीसरा कारण ब्रांड वैल्यू है। इसका कोई काट सरकार के पास फिलहाल नहीं है।

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