-दीपक रंजन दास
कहते हैं जिस कौम को अपने इतिहास की जानकारी नहीं होती, उसे कोई भी-कभी भी बुद्धू बना सकता है। हालात यह हैं कि अब जाकर लोगों को बताना पड़ रहा है कि सन् 1947 में तिरंगा पहली बार 16 अगस्त को फहराया गया था। उधर देश अब तक बाबर (1519), मोहम्मद गोरी (11वीं शताब्दी) पर शोध कर रहा था। जब 1947 का ही ठीक से पता नहीं तो इससे पहले के इतिहास के बारे में तो कुछ भी बताया और समझाया जा सकता है। यह भी आरोप लगाया जाता रहा है कि स्कूल-कालेज में गलत इतिहास पढ़ाया जाता रहा है। कुछ किताबों को तो बदल भी दिया गया है। 200-500 या हजार साल पहले क्या हुआ था उसे जानना दिलचस्प हो सकता है पर उस इतिहास को जानना शायद ज्यादा जरूरी है जिससे हमारा आज सीधे तौर पर प्रभावित होता है। फिलहाल हम 1947 की ही बात करते हैं। भारत की आजादी की घोषणा 14-15 अगस्त, 1947 की दरम्यानी रात 12 बजे की गई थी। उस समय कौंसिल हाउस के ऊपर तिरंगा फहरा रहा था। तब का कौंसिल हाउस आज का संसद भवन है। 15 अगस्त को आजाद भारत की पहली सरकार को सुबह 10.30 बजे वायसरॉय लॉज में शपथ दिलाई जा रही थी। तब भी भारत का ध्वज तिरंगा इसके सेंट्रल डोम पर शान से लहरा रहा था। इस भवन को आज हम राष्ट्रपति भवन के रूप में जानते हैं। इसके अगले दिन 16 अगस्त को लाल किले की प्राचीर पर सुबह 8.30 बजे ध्वजारोहण कर प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने राष्ट्र को संबोधित किया था। पर इससे पहले विभिन्न मुल्कों में भारतीय राजदूतों ने 15 अगस्त को ही प्रात: 8.30 बजे तिरंगा फहराकर भारत की आजादी का जश्न मनाया था। ऑस्ट्रेलिया में भारतीय उच्चायुक्त रघुनाथ परांजपे ने भी 15 अगस्त, 1947 को ही सुबह भारतीय समय 7.30 बजे ध्वजारोहण किया था। अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने वाला यह सबसे बड़ा देश था। एक दो बातें और जान लेना जरूरी होगा। आजादी के जश्न में महात्मा गांधी शामिल नहीं हुए थे। आजादी के साथ ही देश का बंटवारा भी हो गया था और बंगाल में जमकर मार-काट मची हुई थी। महात्मा गांधी नोआखाली (अब बांग्लादेश) में अनशन कर रहे थे। साम्प्रदायिक आधार पर देश के बंटवारे के बीज 1871 में पड़ चुके थे। उस समय की गई जनगणना ने ब्रिटिश हुकूमत का ध्यान हिन्दू मुस्लिम समीकरण की ओर खींचा था। 1905 में बंगाल विभाजन ने उनकी धारणा को और पुष्ट कर दिया था। भारत विभाजन के प्रस्ताव को कल्पना से परे बताने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल को जब लगा कि अब तो विभाजन होकर रहेगा तब कांग्रेस में इस प्रस्ताव के पक्ष में समर्थन जुटाने में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई। पटेल नहीं चाहते थे कि पूरे भारत में दंगे हों। बंटवारा सिर्फ मुल्क का नहीं बल्कि सभी संसाधनों का हुआ था जिसमें ब्रिटिश इंडियन आर्मी, रॉयल इंडियन नेवी, रॉयल इंडियन एयरफोर्स, इंडियन सिविल सर्विस, इंडियन रेलवे, डाक तार विभाग एवं खजाना सबकुछ शामिल था।





