-दीपक रंजन दास
भगवा रंग हिन्दू का, हरा रंग मुसलमान का और सफेद रंग सतनाम और इसाईयत का प्रतीक हो गया. कैसे? किसने किया? कब किया? इन सवालों का जवाब मिलना मुश्किल है. इन्हें केवल समझा जा सकता है. जिस तरह दलीय प्रतियोगिताओं में टीमें अलग-अलग रंग की जर्सी पहनते हैं, किटी पार्टी में महिलाएं ड्रेस कोड रख लेती हैं, यह भी कुछ कुछ वैसा ही है. इनकी अहमियत उससे अधिक नहीं हो सकती. मैच खत्म होने के बाद खिलाड़ी फिर से अपने पसंदीदा रंग पहन लेते हैं. किटी पार्टी खत्म होने के साथ ही ड्रेस कोड भी खत्म हो जाता है. कोई भी रंग दुनिया में ऐसा नहीं है जिसके बिना किसी भी कौम का काम चल जाए. हरा रंग मुसलमान का बोलकर किसी हिन्दू ने साग-भाजी खाना छोड़ दिया हो, पेड़ पौधों की तरफ आंख उठाकर देखने बंद कर दिया हो, ऐसी कभी देखने-सुनने में नहीं आया. भगवा को यदि हिन्दुओं का रंग मान लें दो सुबर शाम के आकाश और अग्नि पर भी हिन्दुओं का अधिकार मान लेना होगा. ये एक बेतुकी बहस है जिसमें सिर खपाना भी वक्त की बर्बादी है. देश का प्रतीक तिरंगा है. यह हमारा आत्मसम्मान और अभिमान भी है. पर यह सेना का रंग नहीं है. सेना जिन परिस्थितियों में जाती है, वैसा ड्रेस कोड अपनाती है. इससे उनके मन में तिरंगे का सम्मान कम नहीं हो जाता. जनवरी में आ रही एक फिल्म में हिरोइन ने भगवा रंग की बिकिनी क्या पहन ली, हंगमा खड़ा हो गया. अब छत्तीसगढ़िया मुख्यमंत्री ने इसमें एंट्री मारी है. उन्होंने भगवा रंग को अग्निशिखा का रंग बताया है. साथ ही यह भी कहा है कि यह ऋषियों का आभूषण रहा है. यह रंग त्याग, तपस्या और बलिदान से जुड़ा है. इस रंग का उपयोग संन्यासी भी करते हैं. उन्होंने पूछा है कि इसे विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल वाले क्यों पहने घूम रहे हैं, इसका उन्हें जवाब देना चाहिए. दरअसल, मुख्यमंत्री किसी को चुनौती नहीं दे रहे. वो केवल उन लोगों की आंखें खोलने की कोशिश कर रहे हैं जो इस तरह की बातों से झांसे में आ जाते हैं. वे ऐसे किसी भी मुद्दे को अशांति का कारण नहीं बनने देना चाहते जिनका वजूद केवल बातों और बतौलेबाजियों तक सीमित है. यह आस्था का प्रश्न भी नहीं है. आस्था पर गौर करेंगे तो आप पाएंगे कि एक ही वस्तु अलग-अलग समय में भिन्न मायने दर्शाती हैं. पत्थर को कोई नहीं पूंजता पर वही पत्थर जब ईश्वर के रूप में पूजा जाता है तो वह पत्थर नहीं रह जाता. इसी तरह भगवा रंग से कुछ नहीं होता. भगवा जब संत पहनें तो उसे सम्मान मिलता है, भिखारी पहने तो उसे दुत्कारा जाता है. स्वामी विवेकानंद के गुरू परमहंस रामकृष्ण सफेद धोती पहनते थे. पर उन्होंने भगवा को अपनाया. उन्हें उनके ज्ञान का सम्मान मिला. इस तरह के सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे.
गुस्ताखी माफ़: और इस तरह से रंगों में बंट गया समाज




