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एक ‘विजय’, कई शिकार! भाजपा में आंतरिक शक्ति संतुलन बनाने कुर्मी नेतृत्व उभारने की तैयारी

By @dmin
Published: September 18, 2021
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एक 'विजय', कई शिकार! भाजपा में आंतरिक शक्ति संतुलन बनाने कुर्मी नेतृत्व उभारने की तैयारी
एक 'विजय', कई शिकार! भाजपा में आंतरिक शक्ति संतुलन बनाने कुर्मी नेतृत्व उभारने की तैयारी
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छत्तीसगढ़ में सामाजिक वोट कबाडऩे में जुटी भाजपा
भिलाई। छत्तीसगढ़ में आदिवासी, साहू व कुर्मी वोटरों को सामने रखकर रणनीति बना रही भारतीय जनता पार्टी जल्द ही पार्टी संगठन में फेरबदल कर सकती है। इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि एक तीर से कई शिकार करने की तैयारी कर रही भाजपा, सांसद विजय बघेल के जरिए नया राजनीतिक समीकरण तैयार कर सकती है। पार्टी के भीतर जो खबरें तैर रही है, उस पर यकीन करें तो विजय बघेल को पार्टी संगठन की कमान सौंपी जा सकती है। इससे एकतरफा कांग्रेस की ओर जा रहे कुर्मी वोटों का न केवल विभाजन होगा, अपितु भाजपा के भीतर भी शक्ति संतुलन को बनाने में सफलता मिलेगी। फिलहाल भाजपा में एक महिला नेत्री का बढ़ता कद कई बड़े नेताओं की चिंता का सबब बना हुआ है।

कुर्मी समाज कांग्रेस का परंपरागत वोट-बैंक रहा है, किन्तु रायपुर क्षेत्र से लगातार सांसद रहे रमेश बैस की वजह से यह समाज भाजपा के पाले में आ गया था। भाजपा ने जिस तरह से रमेश बैस को सक्रिय राजनीति से दूर किया और उन्हें राज्यपाल बनाकर राज्य से ही बाहर कर दिया, उसके बाद कुर्मी समाज भाजपा से नाराज हो गया। ऐसे में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल ने समाज को फिर से संगठित किया और उनका रूख कांग्रेस की ओर मोड़ा। छत्तीसगढ़ में भाजपा यदि लगातार चुनाव जीतती रही तो उसके पीछे साहू-कुर्मी वोटरों की बड़ी भूमिका थी। दुर्ग के सांसद ताराचंद साहू ने सबसे पहले साहू समाज को संगठित और लामबंद किया था। नतीजा यह हुआ कि पूरा साहू समाज एकतरफा भाजपा के पक्ष में वोटिंग करता था। किन्तु भाजपा की भीतरी उठापटक के चलते ताराचंद साहू ने पार्टी छोड़ी और नया क्षेत्रीय दल बनाया। उनके निधन के बाद उनका क्षेत्रीय दल भी बिखर गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब छत्तीसगढ़ दौरे पर आए तो उन्होंने स्वयं को साहू बताया था, जिसके बाद साहू समाज फिर से भाजपा की ओर मुड़ा। वर्तमान में इस समाज का रूझान विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अलग-अलग है।

कुर्मी-साहू जुगलबंदी
पिछले विधानसभा के नतीजों पर गौर करें तो साहू समाज ने बहुधा कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया। इसके विपरीत लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट दिया गया। इन दोनों समाजों के नेतृत्व की चर्चा करें तो जहां स्वयं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कुर्मी समाज के निर्विवाद अगुवा हैं तो वहीं साहू समाज का नेतृत्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू कर रहे हैं जो छत्तीसगढ़ सरकार में ताकतवर मंत्री हैं। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इस बात को लेकर चिंतित है कि जहां एक ओर आदिवासी समुदाय उससे छिटक गया है, वहीं 47 फीसदी आबादी की अगुवाई करने वाला पिछड़ा वर्ग भी उसके साथ नहीं है। यही वजह है कि पार्टी को नए सिरे से विचार करना पड़ा है। जाहिर है कि पार्टी कुर्मी-साहू जुगलबंदी को तोड़ तो नहीं सकती, किन्तु इन वोटों का विभाजन जरूर किया जा सकता है।

कई सवालों का जवाब होंगे विजय
दुर्ग सांसद विजय बघेल को सामने लाने के पीछे कई वजह है। दरअसल, पार्टी के रणनीतिकारों की सोच है कि रमेश बैस के बाद रिक्त हुए स्थान को विजय बघेल भर सकते हैं। इसके जरिए पार्टी से नाराज चल रहे कुर्मी समाज को भी कुछ राहत रहेगी। इसके अलावा यदि विजय बघेल को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी जाती है तो यह सीधे-सीधे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को भी चुनौती होगी। इतना ही नहीं, भाजपा के भीतर एक महिला नेत्री के कथित तौर-तरीकों से पार्टी के बड़े नेता भी नाखुश हैं। संगठन में नियुक्तियों से लेकर टिकट वितरण तक में उक्त नेत्री को एकतरफा महत्व मिलने से भीतरी शक्ति-संतुलन गड़बड़ा गया है। शीर्ष नेताओं की मंशा है कि इस शक्ति संतुलन को बराबर करने से कई दिक्कतें खत्म हो सकती है। इससे जहां पार्टी के भीतर कसावट आएगी, वहीं हताश-निराश कार्यकर्ताओं में भी नया जोश आएगा।

रिकार्ड जीत से पहुंचे लोकसभा
पुराने चेहरों की बजाए नए चेहरों पर दांव लगाने की भाजपाई रणनीति का ही नतीजा था कि विगत लोकसभा चुनाव में पार्टी ने विजय बघेल के चेहरे पर दांव लगाया। भाजपा की यह रणनीति न केवल दुर्ग अपितु पूरे छत्तीसगढ़ में सफल रही। 11 सीटों वाले छत्तीसगढ़ में भाजपा को 9 सीटों पर अभूतपूर्व सफलता मिली। कांग्रेस को कोरबा और बस्तर सीटों पर जीत मिली, वहीं दुर्ग से विजय बघेल ने अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस की प्रतिमा चंद्राकर को 3 लाख 91 हजार 978 मतों के भारी अंतर से हराया। जबकि इससे पहले यह सीट कांग्रेस के ताम्रध्वज साहू के पास थी। कांग्रेस ने साहू को विधानसभा का चुनाव लड़वाया और जीतने के बाद वे छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री बनाए गए। विजय बघेल की बात करें तो उन्होंने सबसे पहले स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में नपाप भिलाई-चरोदा अध्यक्ष का चुनाव जीता था। 2003 में राकांपा की टिकट व पाटन से विधानसभा चुनाव लड़ा, किन्तु भूपेश बघेल से चुनाव हार गए। इसके बाद भाजपा ने उन्हें 2008 में पाटन से ही प्रत्याशी बनाया, जहां उन्होंने भूपेश बघेल को हराकर सनसनी फैला दी थी। इस जीत के साथ ही उन्हें गृह मंत्रालय से संबद्ध कर संसदीय सचिव बनाया गया। 2013 में फिर पार्टी ने उन्हें पाटन से टिकट दी, किन्तु इस बार वे अपनी जीत बचाने में कामयाब नहीं हो पाए। इसके बाद 2019 के आम चुनाव में उन्होंने बड़ी जीत हासिल की।

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