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अटल जयंती विशेष: आलोचना का मतलब दुश्मनी…पक्ष और विपक्ष को खरी-खरी सुनाने वाले वो अटल ही थे

By Om Prakash Verma
Published: December 25, 2022
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अटल जयंती विशेष: आलोचना का मतलब दुश्मनी…पक्ष और विपक्ष को खरी-खरी सुनाने वाले वो अटल ही थे
अटल जयंती विशेष: आलोचना का मतलब दुश्मनी…पक्ष और विपक्ष को खरी-खरी सुनाने वाले वो अटल ही थे
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नई दिल्ली (एजेंसी)। आज पूरा देश पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी को याद कर रहा है। उनकी जयंती पर कई कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। अटल का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि उन्हें पार्टी के नेता ही नहीं विरोधी भी पसंद करते थे।
टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी, अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी।
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं, गीत नया गाता हूं।
आज यह गीत देश के पूर्व प्रधानमंत्री और कवि हृदय अटल बिहारी वाजपेयी की याद दिला रहा है। आज अटल जयंती है और भारत जोड़ो यात्रा लेकर दिल्ली पहुंचे राहुल गांधी भी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित करने जाने वाले हैं। सवाल उठ सकते हैं कि अचानक कांग्रेस को विरोधी विचारधारा के दिग्गज नेता ‘अच्छेÓ क्यों लगने लगे? वाजपेयी कांग्रेस के बारे में क्या सोचते थे, उनके नेताओं के बारे में उनकी राय क्या थी? भारतीय राजनीति के ‘अजातशत्रुÓ के बारे में वैसे तो बहुत कुछ है जिसे आज याद किया जा सकता है लेकिन जब पक्ष और विपक्ष में क्रेडिट लेने की होड़ मची हो, एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिशें हो रही हों तो उनका व्यक्तित्व रास्ता दिखाता मालूम पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में पंडित जवाहर लाल नेहरू पर काफी सवाल खड़े हुए। कश्मीर से लेकर चीन के मसले पर भाजपा ने देश के पूर्व प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। एक साल में कोरोना वैक्सीन बनी तो कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारों पर सवाल उठे और यह नरैटिव सेट करने की कोशिश की गई जैसे पिछले 6-7 दशकों में कुछ हुआ ही नहीं।

Tributes to Atal Ji on his Jayanti. His contribution to India is indelible. His leadership and vision motivate millions of people. pic.twitter.com/tDYNKiGXxj

— Narendra Modi (@narendramodi) December 25, 2022

अटल ने कहा था, 50 साल में हमने प्रगति की है
ऐसे समय में वाजपेयी का संसद में दिया हुआ भाषण सबको सुनना चाहिए। वाजपेयी की ऐसी बेबाक छवि थी कि विपक्ष के नेता भी उनके भाषण के कायल थे। वह दो टूक और स्पष्ट बोलते थे। वह सरकार की अच्छाई की तारीफ और ‘गलत नीतियोंÓ की आलोचना भी करते थे। पूरी दुनिया में उनके भाषण का अंदाज पसंद किया जाता था। लेकिन उस दिन उन्होंने संसद में कहा था, ’50 साल में हमने प्रगति की है। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। चुनाव के दौरान वोट मांगते हुए सरकार की नीतियों पर कठोर से कठोर प्रहार करते हुए, पुरानी सरकार की नीतियों में आलोचना करने लायक बहुत सामग्री थी। हर जगह मैंने ये कहा कि मैं उन लोगों में से नहीं हूं जो 50 वर्ष की उपलब्धियों पर पानी फेर दे। ऐसा करना देश के पुरुषार्थ पर पानी फेरना होगा। ऐसा करना देश के किसान के साथ अन्याय करना होगा। मजदूर के साथ ज्यादती करनी होगी। आम आदमी के साथ वो अच्छा व्यवहार नहीं होगा।

तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने जब कहा "50 साल में हमने प्रगति की है, इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता, में उन लोगों मे से नहीं हूं जो 50 वर्ष की उपलब्धि पे पानी फेर दें, ऐसा करना देश के पुरुषार्थ पे पानी फेरना होगा"https://t.co/29IJzLeXUL pic.twitter.com/QzpFvWWUCm

— Young Indian in Politics (@YIPBharat) December 21, 2022

अटल का सफरनामा
अटल का जन्म आज यानी 25 दिसंबर के दिन 1924 में ग्वालियर में हुआ था। उन्होंने विक्टोरिया कॉलेज (लक्ष्मीबाई कॉलेज) से स्नातक और कानपुर के दयानंद एंग्लो-वैदिक कॉलेज से राजनीति विज्ञान में एमए किया था। 1957 में वह पहली बार उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से चुनकर लोकसभा पहुंचे। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे। आगे 47 वर्षों तक उन्होंने सांसद के रूप में देश की सेवा की। वह 10 बार लोकसभा और 2 बार राज्यसभा के लिए चुने गए। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन और 1975 में आपातकाल के दौरान वह जेल भी गए।

नेहरू का सुनाया था दिलचस्प किस्सा
प्रधानमंत्री रहते वाजपेयी ने एक बार नेहरू से अपने संबंधों को लेकर एक दिलचस्प किस्सा सुनाया था। उन्होंने कहा था, ‘कांग्रेस के मित्र शायद भरोसा नहीं करेंगे। साउथ ब्लॉक में एक नेहरू जी का चित्र लगा रहता था। मैं आते-जाते देखता था। नेहरू जी के साथ सदन में नोंक झोक भी हुआ करती थी। मुस्कुराते हुए अटल ने कहा था कि मैं नया था, पीछे बैठता था। कभी-कभी बोलने के लिए मुझे वॉकआउट करना पड़ता था। लेकिन धीरे-धीरे मैंने जगह बनाई और आगे बढ़ा। जब मैं विदेश मंत्री बन गया तो एक दिन मैंने गलियारे में देखा कि नेहरू जी का टंगा हुआ फोटो गायब है। मैंने कहा कि ये चित्र कहां गया। कोई उत्तर नहीं दिया, वो चित्र वहां फिर से लगा दिया गया। क्या इस भावना की कद्र है? क्या देश में यह भावना पनपे? ऐसा नहीं है कि नेहरू जी से मतभेद नहीं थे। मतभेद चर्चा में गंभीर रूप से उभरकर सामने आती थी। मैंने एक बार पंडित जी से कह दिया था कि आपका एक मिला-जुला व्यक्तित्व है। आपमें चर्चिल भी है और चैंबरलेन भी है। वह नाराज भी नहीं हुए। शाम को मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा कि आज तो बड़ा जोरदार भाषण दिया और हंसते हुए चले गए। आज कल ऐसी आलोचना करना, दुश्मनी को दावत देता है।

Vajpayee, when he was Prime Minister, speaking in Parliament about his relationship with Nehru. pic.twitter.com/i62qERnQQj

— Ramachandra Guha (@Ram_Guha) July 5, 2020

वह तीन बार देश के प्रधानमंत्री बने। पहली बार 1996, 1998 और 1999 में देश की कमान संभाली। उनके नेतृत्व में ही भारत ने 11 मई 1998 को पोखरण में परमाणु परीक्षण किया। पाकिस्तान से रिश्तों को मजबूत करने की कोशिश की और दिल्ली-लाहौर बस सेवा शुरू की। लेखक और कवि अटल को 1992 में पद्म विभूषण और 2015 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 16 अगस्त 2018 को 93 साल की उम्र में वह दुनिया को अलविदा कह गए।

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